अभिभावक!

मुर्दे की भाँति देखता रहता हूँ,
तुझे ऊँची सोच का बनते हुए।
पिछड़ा हूँ… या संवेदनशील,
तुझे अपना, अब भी सोचता हूँ।

क्यूँ तू मेरे चित्त के अनुकूल,
ज़िंदगी में चित्त देख के,
चित्त नहीं होता?

सोचता हूँ… अब भी मैं,
उत्तरदायित्व अपना।

© Amit Choudhary, 2013 (Post 22H)

आभास

हम कहीं और होते थे, जब साथ थे।
हम कहीं और हैं, पर अब साथ हैं।

हर वक़्त बस उनकी छवि का आभास है,
पर उनके होने में कहाँ कुछ ख़ास है।

हम हैं मैं, पर मैं में हम का आगाज़ है।
ये शब्द-कविता के इश्क़ में जालसाज़ हैं।
इंतज़ार चल रहा है, नज़दीकियों का अंदाज़ नहीं।
पास होने पर भी किसी कमी का आभास है।

कुछ तो कम रहा होगा, मेरे प्यार में।
टूटती डालियाँ इस पेड़ की — अकेला ख़याल है।
खाली खड़ा है तना, बंजर और उजाड़ है।
तेरी पथराती, धुँधलाती हँसी — अब मेरा श्वास है।

© अमित चौधरी, २०११ (पोस्ट 15H)