मुर्दे की भाँति देखता रहता हूँ,
तुझे ऊँची सोच का बनते हुए।
पिछड़ा हूँ… या संवेदनशील,
तुझे अपना, अब भी सोचता हूँ।
क्यूँ तू मेरे चित्त के अनुकूल,
ज़िंदगी में चित्त देख के,
चित्त नहीं होता?
सोचता हूँ… अब भी मैं,
उत्तरदायित्व अपना।
© Amit Choudhary, 2013 (Post 22H)
